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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verses 43–47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verses 43–47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 43-47

संस्कृत श्लोक

गच्छत्यवयवः स्पन्दं सुमनःपत्रमर्दने । इह धीमात्ररोधस्तु नाङ्गावयवचालनम् ॥ ४३ ॥ सुखासनोपविष्टेन यथासंभवमश्नता । भोगजालं सदाचारविरुद्धेषु न तिष्ठता ॥ ४४ ॥ यथाक्षणं यथादेशं प्रविचारयता सुखम् । यथासंभवसत्सङ्गमिदं शास्त्रमथेतरत् ॥ ४५ ॥ आसाद्यते महाज्ञानबोधः संसारशान्तिदः । न भूयो जायते येन योनियन्त्रप्रपीडनम् ॥ ४६ ॥ एतावत्यपि येऽभीताः पापा भोगरसे स्थिताः । स्वमातृविष्ठाकृमयः कीर्तनीया न तेऽधमाः ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

यह प्रपंच अति विस्तीर्ण है, इसका करोड़ों कृदालियो से भी छेदन नर्ही हो सकता यह अनायास कैसे नष्ट होगा ? ऐसी शंका कर ज्ञान का प्रभाव ही वैसा है इस अभिप्राय से कहते हैं । फूलों और पल्लवो के (नवीन पत्तों के) मलने में (नख और सुई आदि से उन्हे छेदने में) भले ही कुछ प्रयत्न करना पडे, पर परमपदप्राप्ति मेँ तनिक भी यत्न नहीं करना पड़ता ॥ ४ २॥ ऐसी यदि बात है तो पहले पौरुष का समर्थन क्यो किया 2 ज्ञान के प्रतिबन्धक राग, असंभावना, विपरीतभावना आदि पुरुषापराध के निराकरण के लिए पौरुष का समर्थन किया है । फूल की पांखुडी के मर्दन में भी अंगो में व्यापार होता है, परमार्थपदप्राप्ति में तो बुद्धि व्यापार का भी रोध हो जाता है अंग-प्रत्यंगों के व्यापार की तो कौन कहे ? सुखकर आसन में बैठे हुए, यथायोग्य भोगों का भोग कर रहे, शास्त्रविरूद्ध मार्ग से विमुख एवं देश, काल तथा यथायोग्य सत्संग के अनुसार इस शास्त्र का तथा उपनिषद्‌ आदि का सुखपूर्वक विचार कर रहे पुरुष को संसाररूप क्लेश से मुक्त कर देनेवाला ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता हे । जिसके प्राप्त होने पर पुरुष को फिर माता के उदर में निवास और प्रसवसमय के क्लेश नहीं भोगने पडते । ऐसे प्रशंसनीय ओर सुलभ शास्त्र के रहने पर भी जो पापात्मा नरक आदि क्लेशो से भयभीत न होकर भोगो मेँ आसक्त है, वे अधम माता के मल के कीड़े हैं, उनका नाम लेना भी उचित नहीं हे, क्योंकि वे आत्मघाती हैं