Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verses 19–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verses 19–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 19-41
संस्कृत श्लोक
सा जीवन्मुक्तता तस्य शनैः परिणतिं गता ।
शान्ताशेषविशेषस्य भवत्यविषयो गिराम् ॥ १९ ॥
सर्वार्थशीतला शुद्धा परमालोकदास्यधीः ।
परं प्रकाशमायाति ज्योत्स्नेव शरदैन्दवी ॥ २० ॥
हृद्याकाशे विवेकार्के शमालोकिनि निर्मले ।
अनर्थसार्थकर्तारो नोद्यन्ति किल केतवः ॥ २१ ॥
शाम्यन्ति शुद्धिमायान्ति सौम्यास्तिष्ठन्ति सून्नते ।
अचञ्चले जलेऽतृष्णाः शरदीवाभ्रमालिकाः ॥ २२ ॥
यत्किंचनकरी क्रूरा ग्राम्यता विनिवर्तते ।
दीनानना पिशाचानां लीलेव दिवसागमे ॥ २३ ॥
धर्मभित्तौ भृशं लग्नां धियं धैर्यधुरं गताम् ।
आधयो न विधुन्वन्ति वाताश्चित्रलतामिव ॥ २४ ॥
न पतत्यवटे ज्ञस्तु विषयासङ्गरूपिणि ।
कः किल ज्ञातसरणिः श्वभ्रं समनुधावति ॥ २५ ॥
सच्छास्त्रसाधुवृत्तानामविरोधिनि कर्मणि ।
रमते धीर्यथाप्राप्ते साध्वीवान्तःपुराजिरे ॥ २६ ॥
जगतां कोटिलक्षेषु यावन्तः परमाणवः ।
तेषामेकैकशोऽन्तःस्थान्सर्गान्पश्यत्यसङ्गधीः ॥ २७ ॥
मोक्षोपायावबोधेन शुद्धान्तःकरणं जनम् ।
न खेदयति भोगौघो न चानन्दयति क्वचित् ॥ २८ ॥
परमाणौ परमाणौ सर्ववर्गा निरर्गलाः ।
ये पतन्त्युत्पतन्त्यम्बुवीचिवत्तान्स पश्यति ॥ २९ ॥
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ।
कार्याण्येष प्रबुद्धोऽपि निष्प्रबुद्ध इव द्रुमः ॥ ३० ॥
दृश्यते लोकसामान्यो यथाप्राप्तानुवृत्तिमान् ।
इष्टानिष्टफलप्राप्तौ हृदयेनापराजितः ॥ ३१ ॥
बुद्ध्वेदमखिलं शास्त्रं वाचयित्वा विविच्यताम् ।
अनुभूयत एवैतन्न तूक्तं वरशापवत् ॥ ३२ ॥
शास्त्रं सुबोधमेवेदं सालंकारविभूषितम् ।
काव्यं रसमयं चारु दृष्टान्तैः प्रतिपादितम् ॥ ३३ ॥
बुध्यते स्वयमेवेदं किंचित्पदपदार्थवित् ।
स्वयं यस्तु न वेत्तीदं श्रोतव्यं तेन पण्डितात् ॥ ३४ ॥
यस्मिन्श्रुते मते ज्ञाते तपोध्यानजपादिकम् ।
मोक्षप्राप्तौ नरस्येह न किंचिदुपयुज्यते ॥ ३५ ॥
एतच्छास्त्रघनाभ्यासात्पौनःपुन्येन वीक्षणात् ।
पाण्डित्यं स्यादपूर्वं हि चित्तसंस्कारपूर्वकम् ॥ ३६ ॥
अहं जगदिति प्रौढो द्रष्टृदृश्यपिशाचकः ।
पिशाचोऽर्कोदयेनेव स्वयं शाम्यत्ययत्नतः ॥ ३७ ॥
भ्रमो जगदहं चेति स्थित एवोपशाम्यति ।
स्वप्नमोहः परिज्ञात इव नो भ्रमयत्यलम् ॥ ३८ ॥
यथा संकल्पनगरे पुंसो हर्षविषादिता ।
न बाधते तथैवास्मिन्परिज्ञाते जगद्भ्रमे ॥ ३९ ॥
चित्रसर्पः परिज्ञातो न सर्पभयदो यथा ।
दृश्यसर्पः परिज्ञातस्तथा न सुखदुःखदः ॥ ४० ॥
परिज्ञानेन सर्पत्वं चित्रसर्पस्य नश्यति ।
यथा तथैव संसारः स्थित एवोपशाम्यति ॥ ४१ ॥
सुमनःपल्लवामर्दे किंचिद्व्यतिकरो भवेत् ।
परमार्थपदप्राप्तौ नतु व्यतिकरोऽल्पकः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार आनुषंगिक (गौण) फलों को दर्शा कर मुख्य फल दशति है ।
भूमिका के क्रम से सम्पूर्ण विशेषताओं के शान्त होने पर पुरूष की वह जीवन्मुक्ति
परिपुष्ट हो जाती है, जिसका वाणी से वर्णन नहीं हो सकता । जैसे सम्पूर्ण पदार्थो को शीतल
करनेवाली तथा अत्यन्त प्रकाश करनेवाली शरत्कालकी चाँदनी अत्यन्त शोभा को प्राप्त
होती हे, वैसे ही इस ग्रन्थ का विचार करनेवाले पुरूष की सम्पूर्ण पदार्थो को शीतल करनेवाली
तथा परमात्मा का दर्शन करानेवाली बुद्धि अत्यन्त प्रकाश को प्राप्त होती है हृदयरूपी
आकाश में शम से प्रकाशयुक्त विवेकरूप निर्मल सूर्य के उदित होने पर विविध अनर्थो के
हेतु काम, क्रोध आदि धूमकेतु कभी उदित नहीं होते, इसमें कोई सन्देह नहीं है । जैसे
शरदऋतु में वृष्टि करने में अनिच्छुक मेघमालाएँ उन्नत पर्वत में स्थित होती हैं, स्वच्छता
को प्राप्त होती हैं और शान्त हो जाती हैं, वैसे ही इस ग्रन्थका विचार करने से विषयों में
तृष्णारहित सौम्य पुरुष चंचलतारहित उन्नत स्वात्मपद में स्थित हो जाते हैं, शुद्धि को प्राप्त
होते हैं और शान्त होते हैं । जैसे दिन होने पर पिशाचो की लीला समाप्त हो जाती है, वैसे
ही दूसरों का द्वेष आदि करनेवाली मुख को दीन बनानेवाली कुटिल अश्लीलव्चनताकी निवृत्ति
हो जाती है । जैसे चित्र मे लिखी गई लता को हवा नहीं कपा सकती, वैसे ही धर्मरूपी (शम,
दमरूपी अथवा (& ) परमात्मरूपी) भीत जिसमें एकाग्रता पूर्वक लीन हुई अतएव धेर्यकी
पराकाष्ठा को प्राप्त हुई बुद्धि को मानसिक व्यथाएँ (चिन्ताएँ) विचलित नहीं कर सकती ।
& विश्वरूपी चित्र का आधार होने से धर्म में (परमात्मा में) भीत्तित्तका आरोप किया है ।
तत्त्वज्ञानी पुरुष विषयों में आसक्तिरूपी मोहगर्त में नहीं पड़ता, भला बतलाईए तो सही,
जिसे मार्ग ज्ञात हो गा वह गड्डेकी ओर क्यों दौड़ेगा ? जैसे पतिव्रता नारी अन्तःपुर के आँगन
में ही प्रसन्न रहती है, इधर-उधर नहीं जाती, वैसे ही सत् शास्त्रों के परिज्ञान से उत्तम
चरित्रवाले लोगों की बुद्धि शास्त्र के अनुकूल यथायोग्य प्राप्त कर्म में ही रमण करती है ।
असंगबुद्धिवाला पुरुष, करोड़ों लाख जगता में जितने परमाणु हैं, उनमें से प्रत्येक ब्रह्माण्डों
को अपने अन्तःकरण में देखता है, कारण कि उसे माया की अघटित घटनामें अत्यन्त पट्ता
का ज्ञान हो जाता है । मोक्ष के उपाय के ज्ञान से जब पुरुष शुद्ध अन्तःकरणवाला हो जाता
है, तब उसे विविध भोग न तो क्लेश पहुँचाते हैं और न आनन्द ही देते हैं । प्रत्येक परमाणु
में जो सम्पूर्ण सर्गवर्ग असंकीर्ण होकर जलतरंगों की नाईं आविर्भूत और तिरोभूत होते हैं,
उन्हें असंगबुद्धि पुरुष देखता रहता हे । वह प्राप्त हुए अनिष्ट कार्यो के लिए द्वेष नहीं करता
ओर निवृत्त हुए इष्ट कार्यों की प्राप्ति के लिए इच्छुक नहीं होता, कार्य के फल आदि के
स्वरूप का ज्ञाता होता हुआ भी वह उसे न जाननेवाले वृक्ष के समान रहता है । जो कुछ
मिल गया उससे निर्वाह करनेवाला वह सर्वसाधारण लोगों की नाईं दिखाई देता है, इष्ट या
अनिष्ट वस्तु की प्राप्ति होने पर उसके चित्त मेँ तनिक भी विकार नहीं होता । हे श्रीरामजी,
इस सम्पूर्ण शास्त्र को चवा कर और मोटामोटी जानकर फिर तात्पर्य के पर्यालोचनपूर्वक
प्रत्येक श्लोक का विवेचन कीजिए | इसे आप केवल उक्ति ही न समझिए, किन्तु ब्रह्मा आदि
देवताओं के शाप और वरदान के समान इसका फल अवश्य प्राप्त होता है। माधुर्य तथा
उपमा, यमक आदि अर्थालंकार और शब्दालंकारों से विभूषित कवितामय और रसमय यह
सुन्दर शास्त्र आयास के बिना ही ज्ञात हो जाता है। इसमें दृष्टान्तों द्वारा अर्थ का प्रतिपादन
किया गया है, थोड़ी बहुत भी व्युत्पत्तिवाला पुरुष इसे स्वयं ही जान लेता है । जो इसे स्वयं
नहीं जान सकता, उसे पण्डित के मुखसे इसको सुनना चाहिए । इसके सुनने, विचार करने
और जानने पर मनुष्य को मोक्षप्राप्ति के लिए तपस्या, ध्यान, जप आदि किसीकी भी
आवश्यकता नहीं रहती, कारण कि तपस्या, ध्यान, जप आदि का फल इसके फल से गतार्थ
हो जाता है, यह भाव है । इस ग्रन्थ का खूब अभ्यास करने एवं पुनः पुनः इसके पर्यालोचन
से चित्तसंस्कारपूर्वक अपूर्व पाण्डित्य होता है। यद्यपि अन्य ग्रन्थों के अभ्याससे भी पाण्डित्य
होता है, तथापि वह चित्तसंस्कारपूर्वक नहीं होता, इसलिए इस ग्रन्थ के विचार से जनित
पाण्डित्य को अपूर्व कहा है। जैसे सूर्योदय से पिशाच स्वयं नष्ट हो जाता है, वैसे ही मैं और
जगत् इस प्रकार का अतिप्रौढ़ द्रष्टा ओर दृश्यरूप पिशाच अनायास नष्ट हो जाता है, अर्थात्
द्रष्टा और दृश्य दोनों के शान्त होने से चिन्मात्र शुद्ध आत्मा अवशिष्ट रहता हे । मैं और
जगत् इत्याकारक भ्रम नष्ट हो जाता है, केवल अधिष्ठान ही शेष रह जाता है, जैसे स्वप्न
मोह के ज्ञात होने पर वह भ्रम पैदा नहीं करता, वैसे ही यह भी भ्रम पैदा नहीं करता । जैसे
संकल्प द्वारा निर्मित नगर में पुरुष को हर्ष ओर विषाद नहीं होते अर्थात् संकल्पनिर्मित नगर
के पूर्णतया बन जाने पर हर्ष नहीं होता ओर उसके भंग हो जाने से विषाद नहीं होता, वैसे
ही यह जगत्भम कल्पनामात्र है, ऐसा ज्ञात होने पर फिर यह क्लेशकारक नहीं होता । यह
चित्र लिखित सर्प है, वास्तविक सर्प नहीं है, यों ज्ञात होने पर चित्रसर्प चित्रसर्प-
दर्शनजनितभयप्रद नहीं होता, वैसे ही दृश्यरूपी सर्प का परिज्ञान होने पर यह सुखप्रद अथवा
दुःखप्रद नहीं होता । जैसे यह चित्रलिखित सर्प है, ऐसा ज्ञान होने से चित्र सर्प की सर्पता
नष्ट हो जाती है, वैसे ही संसार के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान होने पर अधिष्ठानपरिशेषपूर्वक
संसार शान्त हो जाता है