Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verses 61–63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verses 61–63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 61,62
संस्कृत श्लोक
स्वप्नाभत्वं च जगतः श्रुते शास्त्रेऽवबोध्यते ।
शीघ्रं न पार्यते वक्तुं वाक्किल क्रमवर्तिनी ॥ ६१ ॥
स्वप्नसंकल्पनाध्याननगराद्युपमं जगत् ।
यतस्त एव दृष्टान्तास्तस्मात्सन्तीह नेतरे ॥ ६२ ॥
अकारणे कारणता यद्बोधायोपमीयते ।
न तत्र सर्वसाधर्म्यं संभवत्युपमाश्रमैः ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
को कहे कि यदि ऐसा है, तो इस ग्रन्थ के श्रोता, जगत् की जो स्वप्न तुल्यता कही गई है,
उसे सहसा क्यो नहीं जान लेते, इस विषय मे विवाद क्यो करते हैं ? इस पर अध्यात्मशास्त्र के
श्रवण से उत्पन्न संस्कार न होनेसे उन्हे जगत् में सत्यत्व-भ्रम है, अतः उन्हे शीघ्र जगत् की
स्वप्नतुल्यता प्रतीत नहीं होती, ऐसा कहते है ।
सम्पूर्ण शास्त्र सुनने पर जगत् की स्वप्नतुल्यता ज्ञात होती है, उसका बोध शीघ्र नहीं
कराया जाता, क्योकि वाणी क्रमशः अपना कार्य करती हे । शार्त्रश्रवण में जो लोग आलस्य
करते हैं, उन्हें जगत् की स्वप्नतुल्यता प्रतीत नही होती, यह भावार्थ हे । चूँकि यह जगत्
स्वप्न, मनोरथ और ध्यान से कल्पित नगर के सदुश है इसलिए वे ही दृष्टान्त यहाँ पर दिये
गये हैं, अन्य नहीं