Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verse 69
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verse 69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 69
संस्कृत श्लोक
विचारणादनुभवकारिवैरिणोऽपि वाङ्मयं त्वनुगतमस्मदादिषु ।
स्त्रियोक्तमप्यपपरमार्थवैदिकं वचो वचःप्रलपनमेव नागमः ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
सभी लोग प्रतिबन्धशून्य स्वेच्छाविहारजनित सुख के प्रार्थी है, अतः दयालु परमहितैषी
चार्वाक आदि का तथा स्त्री, पुरूष, मित्र आदि का विविध विचित्र दृष्टभोगयुखजनक स्वाभाविक
स्वप्रीति के विषयों में प्रवर्तक संसार मे सारता आदि का प्रतिपादक वचन कैसे हेय है ?
तपस्याजनित क्लेश, संयम, धनव्यय तथा परिश्रम करानेवाले; इष्ट पुत्र, धन, स्त्री आदि का
वियोग करानेवाला तथा संन्यास भिक्षाटन आदि हजारों दष्ट अनर्थो से परिपूर्ण निर्विषय
आत्ममात्रपरिशेषरूप परम दारिद्रयभूत मोक्षफल को देनेवाली जीवगब्रह्म की एकता का बोधक
होने से शत्रु के वाक्य से तुल्य अचेतन श्रुतिप्रतिपादित महावाक्य कैसे उपादेय है, ऐसी शंका
होने पर कहते हैं।
ठीक है, विचार न करने से ही वैसा प्रतीत होता है। आपाततः वैरिरूप से ज्ञात हुए वेद का
वाक्य विचार से तो नित्य निरतिशय आनन्द आत्मरूप परमपुरुषार्थ का अनुभव करानेवाला
है, अतः अनुभवनिष्ठ हम लोगो में, वह सम्पूर्ण प्रमाण में सर्वोत्तम है, यों समादृत है। परमार्थभूत
वैदिक पुरुषार्थ से विरहित वचन यदि परम प्रिय स्त्रीका भी कहा हो, तो मरण, नरक, आदि
अनेक अनर्थो का हेतु होने से प्रलापमात्र ही है, वह न तो वेद है, न आप्त पुरुष का वाक्य हे
और न प्रमाण ही है