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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

श्रुतायां प्राज्ञवदनाद्बुद्ध्वान्तं स्वयमेव च । शनैःशनैर्विचारेण बुद्धौ संस्कार आगते ॥ ६ ॥ पूर्वं तावदुदेत्यन्तर्भृशं संस्कृतवाक्यता । शुद्धयुक्ता लतेवोच्चैर्या सभास्थानभूषणम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

गुडजिहिकान्याय से आनुषंगिक फलो को दशनि की इच्छा से श्रीवसिष्ठजी पहले शब्दव्युत्यत्तिरूप प्रथम फल कहते हैँ । विद्वान पुरूष के मुँह से अन्त तक इसका श्रवण कर और स्वयं ही मोटा-मोटी इसका ज्ञान प्राप्तकर विचार से धीरे-धीरे बुद्धि में संस्कार प्राप्त होने पर पहले उन्नत लता के समान सभा को अत्यन्त विभूषित करनेवाली शुद्धवाक्यता हृदय में उत्पन्न होती है