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Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 23

लाईसर्वौ सर्ग समाप्त तेईसवाँ सर्ग॑ प्राणियों के पुण्य ओर पाप के बल से उत्कृष्ट अपनी चेष्टाओं द्वारा प्राणियों से कर्म करा रहे काल का वर्णन |

38 verse-groups

  1. Verse 1इस प्रकार भोग्य श्री, भोगतृष्णा ओर भोगकाल के बाल्यावस्था, युवावस्था ओर वृद्धावस्था के दोष…
  2. Verse 2जाल के समान दूर से ही आकृष्ट कर बाँधनेवाले विषयों तथा पिंजडे के समान परिच्छिन्न स्थान में…
  3. Verse 3इस प्रकार के अवस्तुभूत संसार में जिनको क्षुद्र सुख की आशा होती है, उनकी उस आशा को काल, जै…
  4. Verse 4जैसे बडवाग्नि चन्द्रोदय आदि से उमड़े हुए समुद्र को नष्ट करती है, वैसे ही इस संसार में उत्…
  5. Verses 5–6भयंकर रुद्ररूपी काल सर्वसाधारणरूप से इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच को निगलने के लिए सदा उद्यत…
  6. Verse 7युग, वर्ण ओर कल्प नामक क्रियोपाधिक (क्रिया द्वारा प्राप्त) रूपों से काल अंशतः ही प्रकट है…
  7. Verses 8–9जैसे गरुड़ साँपों को निगल जाता है, वैसे ही काल भी जो अनुपम रूप से सम्पन्न थे, जो पुण्यात्…
  8. Verse 10इसका चित्त सदा निगलने में ही लगा रहता है, यह एक को निगलता हुआ दूसरे को निगलता है। असंख्य…
  9. Verse 11जैसे ऐन्द्रजालिक अपने विविध खेलों को आरम्भ करता है, उनका अन्त कर डालता है, उनको बिगाड़ दे…
  10. Verse 12जैसे तोता दाड़िम के फल को तोड़कर उसके भीतर के बीजों को खा जाता है, वैसे ही यह काल भी इस ज…
  11. Verse 13शुभ और अशुभ (पुण्य और पाप) रूप दाँतों से मनुष्यरूपी पत्तो को छिन्न-भिन्न करनेवाला अभिमानप…
  12. Verse 14अपंचीकृत पंचभूतों से उत्पन्न ब्रह्माण्डरूपी महान्‌ और देवतारूपी फलों से युक्त वृक्षों से…
  13. Verse 15यह काल रात्रिरूपी भँवरों से चारों ओर व्याप्त और दिनरूपी मंजरियों से शोभित वर्ष, कल्प (ब्र…
  14. Verse 16मुनिवर, यह काल धूर्तो का सिरताज है, इसे कितना ही तोड़ो पर यह टूटता नहीं, जलाने पर जलता नह…
  15. Verse 17सर्वव्यापक यह काल मनोराज्य के अनुरूप है। जैसे मनोराज्य एक पलक में किसी वस्तु के स्वरूप को…
  16. Verses 18–19यह काल अपने दुर्विलासों में विलास करनेवाली प्राणियों के कष्ट से ही परिपुष्ट हुई चेष्टारूप…
  17. Verse 20यह काल इतना क्रूर है मानों संसारभर की सम्पूर्ण क्रूरता इसी में कूट-कूट कर भरी गई है, यह ल…
  18. Verse 21जैसे बालक अपने आँगनमें खेलके गेंदों को बारबार उछालता है, वैसे ही यह क्रूरतम काल खेल के (म…
  19. Verse 22प्रलयकाल में यह काल सब प्राणियों को नष्टकर और अपने शरीर को उनकी (सब प्राणियोंकी) हड्डियों…
  20. Verse 23प्रलय के समय निरंकुश चरित्रवाले इस काल के अंगों से निकले हुए वायुओं से विशाल सुमेरु पर्वत…
  21. Verse 24यह काल रुद्र का रूप धारण कर महेन्द्र का रूप धारण करता है, फिर ब्रह्मा का रूप धारण करता है…
  22. Verse 25जैसे सदा परिपूर्ण सागर रात-दिन अपने में अन्य तरंगों को धारण करता हुआ पहले की बड़ी-बड़ी तर…
  23. Verse 26यह काल महाकल्परूपी वृक्षों से देवता, मनुष्य और राक्षसरूपी पके हुए फलों को गिरा रहा हे
  24. Verse 27यह काल प्राणिरूपी बहुत छोटे-छोटे मच्छरों से धुम्‌, धुम्‌ ऐसा शब्द कर रहे और शीघ्र गिरनेवा…
  25. Verse 28तत्‌-तत्‌ प्राणियों के शुभाशुभक्रिया (पुण्य-पाप) रूप प्रियतमा से युक्त काल सब के अधिष्ठान…
  26. Verse 29जैसे महापर्वत (हिमालय) पृथिवीमें पूर्व ओर उत्तर की सीमा से शून्य प्रदेश में स्थित अपने शर…
  27. Verses 30–31यह काल कहीं पर (रात्रि आदि काले पदार्थो मेँ) काले अन्धकार के तुल्य श्यामल, कहीं पर (दिन,…
  28. Verses 32–33सैकड़ों महाकल्पो से न तो इसे खेद होता हे, न प्रसन्नता होती है, न यह आता हे, न जाता है, न…
  29. Verse 34यह काल लगातार रात्रिरूपी पंक से उत्पन्न हुई ओर मेघरूपी भंवरी से युक्त दिनरूपी लाल कमलो की…
  30. Verse 35यह लोभी काल पुरानी सम्मार्जनी (वुहारी) रूपी काली रात्रि को लेकर कनकाचल के (सुमेरु के) चार…
  31. Verse 36लोभी होने के कारण ही कार्यरूपी उंगली से दिशाओं के कोनों मे सूर्यरूपी दीपक ले जाता हुआ यह…
  32. Verses 37–38दिनरूपी पलकों से युक्त सूर्यरूपी नेत्र से ये बहुत अच्छी तरह पक गये हैं, यह देखकर जगत्रूपी…
  33. Verse 39जगत्रूपी पुराने फूस के झोपड़े में प्रमाद से इधर-उधर गिरे हुए गुणवान्‌ जनरूपी मणियों को यह…
  34. Verse 40यह चंचल काल बीच-बीच में दिनरूपी हंसों से गुँथी गई तारारूपी केसर से पूर्ण रात्रिरूपी नीलकम…
  35. Verse 41पर्वत, समुद्र, द्युलोक और पृथिवीरूप चार श्रृंगवाले जगत्रूपी भेड़ों का हिंसक यह काल आकाशरू…
  36. Verse 42यह काल यौवनरूपी कमलिनी के लिए चन्द्रमारूप ओर आयुरूपी गज के लिए सिंहस्वरूप है। इस संसार मे…
  37. Verses 43–44हे
  38. Verse 45बुद्धिकौशल से इस काल के रहस्य का किसीने निश्चय नहीं कर पाया है, पुण्य फल के उपभोग के अनुक…