Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verses 37–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
प्रेक्ष्याहर्विनिमेषेण सूर्याक्ष्णा पाकवन्त्यलम् ।
लोकपालफलान्यत्ति जगज्जीर्णवनादयम् ॥ ३७ ॥
जगज्जीर्णकुटीकीर्णानर्पयत्युग्रकोटरे ।
क्रमेण गुणवल्लोकमणीन्मृत्युसमुद्गके ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
दिनरूपी पलकों से युक्त सूर्यरूपी नेत्र से ये बहुत अच्छी तरह पक गये हैं, यह देखकर
जगत्रूपी पुराने वन से यह लोकपालरूपी फलों को तोड़कर खाता है