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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

सतां कथमिवास्थेह जायते जालपञ्जरे । बाला एवात्तुमिच्छन्ति फलं मुकुरबिम्बितम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जाल के समान दूर से ही आकृष्ट कर बाँधनेवाले विषयों तथा पिंजडे के समान परिच्छिन्न स्थान में बोधनेवाले देह के समूहरूप इस अवस्तुभूत संसार के प्रति विवेकियों को कैसे आदर हो सकता है ? दर्पण में प्रतिबिम्बित फल को बालक ही खाने की इच्छा करते हैं, विवेकी नहीं । भाव यह है कि जैसे दर्पण में प्रतिबिम्बित फल को खाने की इच्छा करना मूर्खता है, वैसे ही अवस्तुभूत इस संसार में आस्था करना मूर्खता ही है