Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
सत्तामात्रकुमुद्वत्या चिज्ज्योत्स्नापरिफुल्लया ।
वपुर्विनोदयत्येकं क्रियाप्रियतमान्वितः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्-तत् प्राणियों के शुभाशुभक्रिया (पुण्य-पाप) रूप प्रियतमा से युक्त काल सब
के अधिष्ठानभूत चित्रूप (चैतन्यरूप) चाँदनी के केवल सन्निधान से प्रकट हुई जगत् की सत्तारूपी
कुमुदिनीयों से प्राणियों की क्रियारूप अपनी स्त्री अपने अद्वितीय स्वरूप को विनोदित करता है।
विहारकौतुक से कालयापन ही विनोद हे । यहाँ पर काल ही विहार करनेवाला है । विहार करनेवाला
काल जिस काल का यापन करे ऐसा दूसरा काल प्रसिद्ध नहीं हे, अतः स्वशरीर को ही विनोदित करता
है, यह भाव है