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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verses 32–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 32,33

संस्कृत श्लोक

न खिद्यते नाद्रियते नायाति न च गच्छति । नास्तमेति न चोदेति महाकल्पशतैरपि ॥ ३२ ॥ केवलं जगदारम्भलीलया घनहेलया । पालयत्यात्मनात्मानमनहंकारमाततम् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

सैकड़ों महाकल्पो से न तो इसे खेद होता हे, न प्रसन्नता होती है, न यह आता हे, न जाता है, न अस्त को प्राप्त होता है ओर न उदित होता हे । यह काल अत्यन्त अनादरपूर्वक जगत्‌ की रचनारूप लीला से अहंकार से रहित और सर्वत्र व्याप्त अपनी आत्मा का पालन ही करता हे, उसका विनाश कभी नहीं करता