Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
दुर्विलासविलासिन्या चेष्टया कष्टषुष्टया ।
द्रव्यैकरूपकृद्रूपं जनमावर्तयन्स्थितः ॥ १८ ॥
तृणं पांसुं महेन्द्रं च सुमेरुं पर्णमर्णवम् ।
आत्मंभरितया सर्वमात्मसात्कर्तुमुद्यतः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
यह काल अपने दुर्विलासों में विलास करनेवाली
प्राणियों के कष्ट से ही परिपुष्ट हुई चेष्टारूपी भार्या द्वारा भौतिक देह, इन्द्रिय आदि द्रव्यो में
तादात्म्याध्यास होने के कारण अपने वास्तविक स्वरूप को न जाननेवाले जीव को स्वर्ग ओर नरक में
घुमा रहा है। यह काल बड़ा पेटू है, इसको सदा अपने पेट भरने की ही चिन्ता रहती है, चाहे तिनका हो,
चाहे धूलि हो, चाहे इन्द्र हो, चाहे सुमेरु हो, चाहे पत्ता हो, चाहे समुद्र हो, सभी को अपने आधीन करने
के लिए निगलने के लिए उद्यत रहता है