Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
धत्तेऽजस्रोत्थितोद्ध्वस्तान्सर्गानमितभास्वरान् ।
अन्यान्दधद्दिवानक्तं वीचीरब्धिरिवात्मनि ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सदा परिपूर्ण सागर रात-दिन अपने में अन्य तरंगों को धारण करता हुआ पहले की
बड़ी-बड़ी तरंगों को नीचेकर देता है अर्थात् अपनेमें विलीन कर देता है, वैसे ही तत्परतापूर्वक रात-
दिन अन्य नई-नई सृष्टियों को करता हुआ यह काल पूर्व की अति दैदीप्यमान सृष्टियों को नष्टकर
देता हे