Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
भिद्यते नावभग्नोऽपि दग्धोऽपि हि न दह्यते ।
दृश्यते नापि दृश्योऽपि धूर्तचूडामणिर्मुने ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिवर, यह काल धूर्तो का सिरताज है, इसे कितना ही तोड़ो पर यह टूटता नहीं, जलाने पर
जलता नहीं और दृश्य होने पर भी स्वरूप से नहीं दिखाई देता इसकी धूर्तता की सीमा नहीं है