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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

एकेनैव निमेषेण किंचिदुत्थापयत्यलम् । किंचिद्विनाशयत्युच्चैर्मनोराज्यवदाततः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वव्यापक यह काल मनोराज्य के अनुरूप है। जैसे मनोराज्य एक पलक में किसी वस्तु के स्वरूप को हूबहू खड़ा कर देता है और किसीको बिलकुल विनष्ट कर डालता है, वैसे ही यह काल भी एक ही पलक त) १८ निमेष की १ काष्टा, ३० काष्टा की १ कला, २० कला का १ क्षण, १२ क्षण का १ मुहूर्त, ३० मुहूर्त का १ अहोरात्र (रात्रि-दिन) इस प्रकार आजकल के मानसे १ कला =२/१५ मिनट या ८ सेकण्ड है। में किसी वस्तु को सवांगपूर्ण बनाकर खड़ा कर देता है और किसी वस्तु को नि:शेष विनष्ट कर देता है, इसलिए इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है