Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
विरिञ्चिमूलब्रह्माण्डबृहद्देवफलद्रुमम् ।
ब्रह्मकाननमाभोगि परमावृत्य तिष्ठति ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
अपंचीकृत पंचभूतों से उत्पन्न ब्रह्माण्डरूपी
महान् और देवतारूपी फलों से युक्त वृक्षों से पूर्ण (अर्थात् ब्रह्मरूपी वनमें अंपचीकृत पंचभूतों से
उत्पन्न अनेक ब्रह्माण्ड ही महान् वृक्ष हैं, और देवता ही ब्रह्माण्ड रूपी महावृक्षों के फल हैं) और मायिक
जगत् रूप से युक्त (सप्रपंच) ब्रह्मरूपी महावन को (दुस्तर होने के कारण ब्रह्म को महावन कहा)
पूर्णरूप से आवृत्त करके (ढँककर) यह काल बैठा है, क्योंकि काल के उदर में ही सब वस्तुओं की
उत्पत्ति, स्थिति और विनाश देखा जाता है, यह भाव है