Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
गुणैरापूर्यते यैव लोकरत्नावली भृशम् ।
भूषार्थमिव तामङ्गे कृत्वा भूयो निकृन्तति ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत्रूपी पुराने फूस के
झोपड़े में प्रमाद से इधर-उधर गिरे हुए गुणवान् जनरूपी मणियों को यह काल महान् उदरवाले मृत्युरूपी
सन्दूक में क्रमश: डालता है ॥ ३ ८॥ जो जनरूपी रत्नावली गुणों से (सूत्रों से) अत्यन्त पूर्ण हो जाती है,
मानों अलंकार के लिए उसको अपने अवयवरूप सत्य, त्रेता आदि युगों में रखकर फिर उन्हें नष्ट कर
देता है