Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
दिनहंसानुसृतया निशेन्दीवरमालया ।
तारकेसरयाजस्रं चपलो वलयत्यलम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
यह चंचल काल बीच-बीच में दिनरूपी हंसों से गुँथी गई तारारूपी केसर से पूर्ण रात्रिरूपी
नीलकमलों की माला को पाँच ऋतुरूपी अंगुलियों से युक्त वर्षरूपी हाथ के प्रकोष्ठ में कंकण के समान
नित्य धारण करता है