Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
क्रौर्यमत्रैव पर्याप्तं लुब्धतात्रैव संस्थिता ।
सर्वदौर्भाग्यमत्रैव चापलं वापि दुःसहम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
यह काल इतना क्रूर है मानों संसारभर की सम्पूर्ण
क्रूरता इसी में कूट-कूट कर भरी गई है, यह लोभी इतना है कि संसारभर की लुब्धता इसे अपना घर
बनाये है, सम्पूर्ण दुर्भाग्यों का यह आगार है ओर दुःसह चपलता भी इसीमें है अर्थात् यह सबसे अधिक
क्रूर, बेजोड लोभी, नितान्त अभागा और महाचपल है