Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 17
सोलहवाँ सर्ग समाप्त सत्रहवाँ सर्ग दीनता, कृपणता ओर मृत्यु देनेवाल, सम्पूर्णं जगत् को मोह में डालनेवाली तथा अनेकविध पापों की जननी तृष्णा की निन्दा ।
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- Verse 1रामचन्द्रजी ने कहा : परमप्रेमास्पद आत्मतत्त्व का तिरोधान होने के कारण अंधकारपूर्ण रात्रिर…
- Verse 2जैसे ताप पहुँचानेवाली सूर्य की किरणें कीचड़ के रस ओर मृदुता का अपहरण करके कीचड़ को सूखा द…
- Verse 3व्यामोहरूप अन्धकार से व्याप्त विचारशून्य मेरे चित्तरूपी बड़े जंगल में ताण्डव -नृत्य करनेव…
- Verse 4तत्-तत् आर्त वचन द्वारा रचित अश्रुरूप नीहार (ओस) कणों से युक्त और समीपस्थ सुवर्णं आदि क…
- Verse 5जैसे मध्य भाग को चंचल करनेवाली तरंग समुद्र में केवल भ्रमण करने के लिए ही विषम ऊर्ध्व नाट्…
- Verse 6बढ़े हुए अधिक्षेप, अनृप भाषण आदिरूप प्रचण्ड कल्लोल शब्दों से युक्त अतएव उक्त तरगों से तरल…
- Verse 7यद्यपि मैं अपनी चपलता को रोकने के लिए धर्ममेघा समाधि आदि में तत्पर हूँ, तथापि जैसे आँधी ज…
- Verses 8–10मैं विवेक, वैराग्य आदि गुणों से युक्त पदार्थों के विषय में जिस जिस आस्था का (उत्साह का) आ…
- Verses 11–12हे मुनिवर, तृष्णारूपी ज्वाला से मैं इस प्रकार दग्ध हो गया हूँ कि मुझे अमृत से भी अपने दाह…
- Verses 13–14धर्म और अधर्म के अनुसार नित्य स्वर्ग और नरक में गमन और आगमन करानेवाली, भोक्ता ओर भोग्य के…
- Verse 15जैसे बहेलिये की रत्री पक्षियों को फसाने के लिए जाल बनाती हे वैसे ही सदा आकर्षण- स्वभाववाल…
- Verses 16–17यद्यपि मैं धीर हूँ, तथापि भयंकर काली रात्रि की नाई तृष्णा मुझे उरा रही है, विवेकरूपी चक्ष…
- Verse 18पुरुषों के हृदय को भेदन करनेवाली, बन्धन, रोग आदि की या सारे प्रपंच की उत्पादक, दुर्भाग्य…
- Verse 19हे ब्रह्मन्, अनेक तन्त्रियों (तारों) और नाड़ियों से वेष्टित शरीर को धारण करनेवाली तृष्णा…
- Verses 20–21नित्य अतिमलिन, परिणाम में दुःखप्रद उन्माद को देनेवाली, दीर्घं तन्त्रियोँ से युक्त तथा विष…
- Verse 22चित्त को अपने वश में करने में असमर्थ वृद्ध वेश्या के समान तृष्णा प्रत्येक पुरुष के पीछे द…
- Verse 23अनेक प्रकार के शोक, मोह आदि रसों से परिपूर्णं इस महान् संसारसमूह में भुवनरूपी विस्तृत ना…
- Verse 24संसाररूप विशाल जंगल में जरा, मरण आदि विकसित कुसुमं से युक्त एवं विनिपात और उत्पात आदि फलो…
- Verse 25तृष्णा जीर्णं नर्तकी के समान जिस कार्य के साधन मेँ अशक्त हे, (नर्तकी के पक्ष में) जहाँ जा…
- Verses 26–27चिन्तारूपी चपल मयूरी निहार में निहारसदृश मोहावरण में -नृत्य करती है, आलोक के आनेपर-विवेकर…
- Verse 28जैसे क्षुधा ओर तृषा से व्याकुल चिड़िया फलशून्य वृक्ष को छोडकर फलवाले अन्य वृक्षपर चली जात…
- Verse 29चंचल बन्दरीरूपी तृष्णा दुष्प्राप्य स्थान मेँ भी अपना कदम रखती हे, तृप्त होने पर भी फल की…
- Verses 30–32जैसे प्राणियों के कर्मो के अनुसार विधाता सदा चेष्टा करते हैं, वैसे ही यह तृष्णा भी शुभ कर…
- Verse 33क्षण में पाताल में जाती है, क्षण मेँ आकाश की ओर उडती है, क्षण में दिशारूप निकुंजों में घू…
- Verse 34जैसे अनेक पशुओं के बाँधने के लिए गले में लगी हुई रस्सियों से ग्रथित मालासदृश तिरछी विस्तृ…
- Verses 35–37जैसे इन्द्रधनुष विस्मयोत्पादक अनेक प्रकार के रूपों से युक्त, विगुण-ज्या से रहित, लम्बा-चौ…
- Verses 38–40तृष्णा गुणरूपी धान्यों के लिए वजर है, फलरूप आपत्तियों के लिए शरद्ऋतु है, संवित्रूप-तत्त्…
- Verse 41यों तृष्णा का वर्णन कर अब तृष्णा की शान्ति का फल कहते है । जैसे गाढ अन्धकार से अंधेरी कृष…
- Verse 42वेदान्त आदि अध्यात्मशास्त्रो के विचार से शून्य अतएव व्याकुलचित्त के संसारी लोग तभी तक मोह…
- Verse 43उसके त्याग का क्या उपाय है 2 इस पर कहते हैं। यहाँ पर चिन्ता का अर्थ विषयों का स्मरण हे ।…
- Verse 44जैसे तालाब में रहनेवाली मछली घास-पत्ती, पत्थर-लकडी आदि सभी मेरा भक्ष्य है, ऐसा समझकर अन्त…
- Verse 45जैसे सूर्य की किरणें मुकुलित कमल को विकसित करा देती हैं, वैसे ही रोग, पीडा, स्त्री ओर तृष…
- Verse 46तृष्णा वोँस की लता के समान सदा अन्तःसारशून्य (भीतर से खोखली) , ग्रन्थियों से युक्त (तृष्ण…
- Verses 47–48विवेक भी तृष्णा के नाश में हेतु हैं, ऐसा दशति है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसी दुश्छे…
- Verse 49हे ब्रह्मन् जीवों के हृदय में स्थित तृष्णा जैसी तीक्ष्ण न तो तेज तलवार की घार है, न वजाग…
- Verse 50हे महर्षि, एकमात्र विषयतृष्णा ही मेरु के सदुश अति उन्नत, गौरवशाली, पराक्रमी, अयाचित व्रत…
- Verse 51किसी ने कहा भी है : तृणाल्लघुतरस्तूलस्तूलादपि च याचकः । वायुना किं न नीतोऽसौ मामयं याचयि…
- Verse 52तृष्णा कैसे विस्तीर्ण है, कैसे दुर्लक्ष्य है और कैसे एक है ? क्योकि आश्रय, विषय ओर वाचक श…