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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 26–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verses 26–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 26,27

संस्कृत श्लोक

भृशं स्फुरति नीहारे शाम्यत्यालोक आगते । दुर्लङ्घयेषु पदं धत्ते चिन्ता चपलबर्हिणी ॥ २६ ॥ जडकल्लोलबहुला चिरं शून्यान्तरान्तरा । क्षणमुल्लासमायाति तृष्णा प्रावृट्तरङ्गिणी ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

चिन्तारूपी चपल मयूरी निहार में निहारसदृश मोहावरण में -नृत्य करती है, आलोक के आनेपर-विवेकरूप प्रकाश होने पर-शान्त हो जाती है, ओर असाध्य वस्तुओं में अपना कदम रखती हे । मयूरी भी वर्षा में नृत्य करती हैं, शरत्‌ में शान्त हो जाती है ओर दुर्गम स्थानों मेँ गमन करती है । जैसे अन्यकाल में बहुत दिनों तक शून्य रहनेवाली ओर वर्षा में भी बीच-बीच में शून्य रहनेवाली नदी वर्षाकाल में जलकल्लोंलों से प्रचुर होकर क्षण में ही उल्लास को प्राप्त होती है, वैसे ही चिरकाल तक शून्य, फल पानेपर भी मध्य-मध्य में शून्य यह तृष्णा जड़ पदार्थो मं अनेक प्रकार के कल्लोल से-आनन्दों से - पूर्ण होकर क्षण मेँ ही उल्लसित हो जाती है