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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 13–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

जडसंसर्गिणी तृष्णा कृतोर्ध्वाधोगमागमा । क्षुब्धा ग्रन्थिमती नित्यमारघट्टाग्ररज्जुवत् ॥ १३ ॥ अन्तर्ग्रथितया देहे सर्वदुश्छेदयाऽनया । रज्ज्वेवाशु बलीवर्दस्तृष्णया वाह्यते जनः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

धर्म और अधर्म के अनुसार नित्य स्वर्ग और नरक में गमन और आगमन करानेवाली, भोक्ता ओर भोग्य के तादात्म्याध्यास एवं संसर्गाध्यास से युक्त, जड़ पदार्थो से सम्बद्ध एवं विक्षुब्ध तृष्णा घटीयन्त्र के ऊपर लगी हुई रज्जु के समान हे । उक्त रज्जु भी सदा ऊपर नीचे आती जाती रहती है, जल से सम्बन्ध रखती है, गाँठवाली है एवं चंचल रहती हे । देह के भीतर मन में गूँथी गई तथा किसी प्रकार किसीसे विच्छिन्न न की जानेवाली इस तृष्णारूपी रज्जु से बैल के समान ये मनुष्य अत्यन्त शीघ्रता से एेहिक ओर आमुष्मिक (परलोक के) फल के हजारों साधनरूपी भार को वहन करते हैँ