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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

उज्ज्वलाऽसिततीक्ष्णाग्रा स्नेहदीर्घदशा परा । प्रकाशा दाहदुःस्पर्शा तृष्णा दीपशिखा इव ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ब्रह्मन्‌ जीवों के हृदय में स्थित तृष्णा जैसी तीक्ष्ण न तो तेज तलवार की घार है, न वजाग्नि की चिनगारियाँ हैं और न बन्दूक की गोलियाँ (छर) ही हैं ॥४ ८॥ अर्थात्‌ तलवार की धार आदि बाह्य होने के कारण प्राणी के लिए कदाचित्‌ ही अनर्थकारी होते हैं, पर हृदय में रहने के कारण तृष्णा सदा ही अनर्थकारिणी होती है, इसलिए वह तलवार की धार आदि से भी बढ़कर है, यह आशय है। जैसे दीये की लौ मध्य में उज्जवल और अन्त मेँ कृष्णवर्ण, अग्रभाग से तीक्ष्ण, स्नेह से युक्त, दीर्घदशायुक्त, प्रकाशमान ओर दुःस्पर्शं होती है, विषयतृष्णा भी ठीक वैसे ही है अर्थात्‌ जैसे दीये की लौ पहले उज्जवल होती है, अन्त में उसका अग्रभाग काला ओर तीखा हो जाता है, उसमें तेल रहता है, बड़ी वत्ती रहती है ओर सन्ताप इतना अधिक रहता हे कि उसे कोई छू नहीं सकता, वैसे ही विषयतृष्णा भी पहले भोग और वैभव से उज्जवल रहती है, अन्त में तमोगुण और मृत्यु का कारण होती है, माता, रत्री और पुत्र के स्नेह से दीर्घ और उत्कृष्ट वाल्य, यौवन और वार्धक्य अवस्थाओं से युक्त, प्रत्यक्ष ओर इष्टवियोग से उत्पन्न हार्दिक क्लेश से असह्य है