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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

सप्तदशः सर्गः श्रीराम उवाच । हार्दान्धकारशर्वर्या तृष्णयेह दुरन्तया । स्फुरन्ति चेतनाकाशे दोषकौशिकपङ्कतयः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

रामचन्द्रजी ने कहा : परमप्रेमास्पद आत्मतत्त्व का तिरोधान होने के कारण अंधकारपूर्ण रात्रिरूपी दुरन्त तृष्णा से इस चेतनात्मक गगन में जीव में अनेक तरह की राग आदि दोष स्वरूप उल्लूओं की पंक्तियाँ स्फुरने लगती हैं

सर्ग सन्दर्भ

सोलहवाँ सर्ग समाप्त सत्रहवाँ सर्ग दीनता, कृपणता ओर मृत्यु देनेवाल, सम्पूर्णं जगत्‌ को मोह में डालनेवाली तथा अनेकविध पापों की जननी तृष्णा की निन्दा ।