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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

तृष्णाभिधानया तात दग्धोऽस्मि ज्वालया तथा । यथा दाहोपशमनमाशंके नामृतैरपि ॥ ११ ॥ दूरं दूरमितो गत्वा समेत्य च पुनःपुनः । भ्रमत्याशु दिगन्तेषु तृष्णोन्मत्ता तुरङ्गमी ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुनिवर, तृष्णारूपी ज्वाला से मैं इस प्रकार दग्ध हो गया हूँ कि मुझे अमृत से भी अपने दाह की शान्ति की सम्भावना नहीं है। तृष्णारूपी उन्मत्त घोड़ी यहाँ से अतिदूर जाकर और फिर फिर वापस आकर बडी शीघ्रता से चारों ओर घूम रही है