Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
अन्तःशून्या ग्रन्थिमत्यो दीर्घस्वाङ्कुरकण्टकाः ।
मुक्तामणिप्रिया नित्यं तृष्णा वेणुलता इव ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
तृष्णा वोँस की लता के समान सदा अन्तःसारशून्य
(भीतर से खोखली) , ग्रन्थियों से युक्त (तृष्णाओं के पक्ष में दुराग्रहरूपी ग्रन्थयो से युक्त और बाँस के
पक्ष में पोररूपी ग्रन्थियों से युक्त), बड़ी बड़ी चिन्ताओं ओर दुःखों से पूर्ण ( बाँस के पक्ष में बड़े बड़े
कोंपलों के काँटों से युक्त), मोती ओर मणियों पर प्रेम करनेवाली (बाँस के पक्ष मे सर्वजन प्रिय मोतीरूपी
मणियों की उपलब्धि के स्थान) है अर्थात् जैसे बाँस की लताएँ सदा भीतर से खोखली रहती हैं, उनके
बीच में बहुत सी गाँठें होती हैं, उनमें बड़े बड़े कोंपलों के कोटि होते हैँ ओर सर्वजन मनोहर मोती उनमें
उपलब्ध होते हैं, वैसे ही तृष्णाएँ भी खोखली, दुराग्रह से भरी, बडी चिन्ताओं ओर कष्टों से पूर्ण और
मोती, मणि आदि धन सम्पत्ति में अति प्रेम करनेवाली होती हैं