Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 8–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 8 -10
संस्कृत श्लोक
यां यामहमतीवास्थां संश्रयामि गुणश्रियाम् ।
तां तां कृन्तति मे तृष्णा तन्त्रीमिव कुमूषिका ॥ ८ ॥
पयसीव जरत्पर्णं वायाविव जरत्तृणम् ।
नभसीव शरन्मेघश्चिन्ताचक्रे भ्रमाम्यहम् ॥ ९ ॥
गन्तुमास्पदमात्मीयमसमर्थधियो वयम् ।
चिन्ताजाले विमुह्यामो जाले शकुनयो यथा ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
मैं
विवेक, वैराग्य आदि गुणों से युक्त पदार्थों के विषय में जिस जिस आस्था का (उत्साह का) आश्रय
करता हूँ, उस उस आस्था को मेरी तृष्णा इस तरह काट देती है, जिस तरह चूहा वीणा के चर्मसूत्र को
काटदेता हैं। जैसे जल के आवर्त में (भौरी में) पुराना पत्ता, वायु में लघु तृण और आकाश में शरत्कालीन
मेघ यत्र-तत्र घूमते रहते हैं, वैसे ही में चिन्तारूपी चक्र में घूम रहा हूँ। जैसे जाल में फँसे हुए पक्षी अपने
घोंसले में जाने के लिए असमर्थ होने से जाल में ही पड़े रहते हैं, वैसे ही अपने पारमार्थिक स्वरूप को
प्राप्त करने में असमर्थ हुए हम लोग चिन्तारूपी जाल में मुग्ध हो रहे हैं