Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
संस्तीर्णगहना भीमा घनजालरजोमयी ।
सान्धकारोग्रनीहारा तृष्णा विन्ध्यमहातटी ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
किसी ने कहा भी है :
तृणाल्लघुतरस्तूलस्तूलादपि च याचकः । वायुना किं न नीतोऽसौ मामयं याचयिष्यति ॥
अथात् तृण से रुई हलकी होती है ओर रुई से भी याचक हलका है । रुई को हवा उड़ा ले जाती है,
पर याचक मुझसे भी कोई याचना करेगा, यह समझकर हवा उसे नहीं उड़ाती ।
जैसे विन्ध्याचल अनेक बड़े बड़े अरण्यों से पूर्ण निविडतारूपी जाल ओर घूलिपटल से आच्छन्न
एवं भीषण अन्धकार ओर घने कुहरे से व्याप्त होता है, वैसे ही विषयपिपासारूपिणी तृष्णा भी अरण्यतुल्य
अनेक बड़े बड़े साहस के कार्यो से युक्त, पतन हेतु होने से भयंकर, निबिड जाल की नाई बन्ध में
हेतुभूत आशारूपी रस्सी से ओर रजोगुण से बनी हुई एवं अज्ञानरूपी कुहरे से व्याप्त है अथवा
“संस्तीर्णगहना" पदका - एक ही विषयतृष्णा आशा, काम, लोभ, लम्पटता आदि के रूप से चौदहों
भुवनो में व्याप्त और दुर्लक्ष्य है - ऐसा अर्थ हे