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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

नष्टमुत्सृज्य तिष्ठन्तं तृष्णा वृक्षमिवापरम् । पुरुषात्पुरुषं याति तृष्णा लोलेव पक्षिणी ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे क्षुधा ओर तृषा से व्याकुल चिड़िया फलशून्य वृक्ष को छोडकर फलवाले अन्य वृक्षपर चली जाती है, वैसे ही यह तृष्णा एक पुरुष को छोडकर अन्य पुरुष के पास चली जाती हे