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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 30–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verses 30–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

इदं कृत्वेदमायाति सर्वमेवासमञ्जसम् । अनारतं च यतते तृष्णा चेष्टेव दैविकी ॥ ३० ॥ क्षणमायाति पातालं क्षणं याति नभस्थलम् । क्षणं भ्रमति दिक्कुञ्जे तृष्णा हृत्पद्मषट्पदी ॥ ३१ ॥ सर्वसंसारदोषाणां तृष्णैका दीर्घदुःखदा । अन्तःपुरस्थमपि या योजयत्यतिसंकटे ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे प्राणियों के कर्मो के अनुसार विधाता सदा चेष्टा करते हैं, वैसे ही यह तृष्णा भी शुभ कर्म का आरम्भ करके उसकी समाप्ति न करके अशुभ, अनुचित, असमंजस या प्रक्रमविरुद्ध सभी कार्यो का अनुसरण करती है, उपरत नहीं होती, किन्तु शुभाशुभ के लिए सर्वदा चेष्टा करती रहती है