Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 38–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verses 38–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 38-40

संस्कृत श्लोक

व्यवहाराब्धिलहरी मोहमातङ्गश्रृङ्खला । सर्गन्यग्रोधसुलता दुःखकैरवचन्द्रिका ॥ ३८ ॥ जरामरणदुःखानामेका रत्नसमुद्गिका । आधिव्याधिविलासानां नित्यं मत्ता विलासिनी ॥ ३९ ॥ क्षणमालोकविमला सान्धकारलवा क्षणम् । व्योमवीथ्युपमा तृष्णा नीहारगहना क्षणम् ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

तृष्णा गुणरूपी धान्यों के लिए वजर है, फलरूप आपत्तियों के लिए शरद्‌ऋतु है, संवित्रूप-तत्त्वज्ञानरूप-कमलों के लिए हिम है-विघातिका है एवं अज्ञान के लिए दीर्घ हेमन्त की रात्रि है ॥३ ६॥ तृष्णा संसाररूप नाटक में नटी है, प्रवृत्तिरूप घोंसले में रहनेवाली चिड़िया है, मनोरथरूप अरण्यों में रहनेवाली हरिणी है और स्मरको-कामदेव को बढ़ाने के लिए संगीतवीणा है ॥ ३ ७॥ तृष्णा व्यवहाररूपी समुद्र की लहरी है, मोहरूप मत्त हाथियों की श्रृंखला है, सृष्टिरूप वटवृक्ष की सुन्दर लता है, दुःखरूप कमलीनियों की चन्द्रिका है, जरा, मरणरूप दुःखो की एक रत्नपेटिका है और सदा आधि,व्याधिरूप विलासों की मदमत्त विलासिनी है। तृष्णा को आकाशरूपी मार्ग की उपमा दी जा सकती है, क्योंकि जैसे आकाश कभी सूर्यप्रकाश से निर्मल हो जाता है, कभी मेघाच्छन्न होने पर कुछ-कुछ अँधियारी छा जाती है ओर कभी कुहरे से आवृत्त हो जाता है, वैसे ही तृष्णा भी कभी तनिक विवेकरूपी प्रकाश से निर्मल हो जाती है, विवेक न होने पर अज्ञान से मलिन और कभी कुहरे के तुल्य व्यामोह से व्याप्त हो जाती हे