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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

गच्छत्युपशमं तृष्णा कायव्यायामशान्तये । तमी घनतमःकृष्णा यथा रक्षोनिवृत्तये ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

यों तृष्णा का वर्णन कर अब तृष्णा की शान्ति का फल कहते है । जैसे गाढ अन्धकार से अंधेरी कृष्णपक्ष की रात्रि निशाचरो (राक्षसां) के प्रचार के अभाव के लिए विनष्ट हो जाती है अर्थात्‌ राक्षसो का इतस्ततः गमन न हो, इसलिए बीत जाती है, वैसे ही तृष्णा भी देहप्रयुक्त परिश्रम की शान्ति के लिए (मुक्ति के लिए) नष्ट हो जाती हे । अर्थात्‌ तृष्णा की शान्ति होने से मुक्ति हो जाती है