Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
पदं करोत्यलङ्घ्येऽपि तृप्तापि फलमीहते ।
चिरं तिष्ठति नैकत्र तृष्णा चपलमर्कटी ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
चंचल बन्दरीरूपी तृष्णा दुष्प्राप्य स्थान मेँ भी अपना कदम रखती हे, तृप्त होने पर भी फल
की आशा करती है, एक स्थान पर अधिक कालतक नहीं ठहरती, अतः वह चपल बन्दरी है