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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

तृणपाषाणकाष्ठादिसर्वमामिषशङ्कया । आददाना स्फुरत्यन्ते तृष्णा मत्स्यी ह्रदे यथा ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे तालाब में रहनेवाली मछली घास-पत्ती, पत्थर-लकडी आदि सभी मेरा भक्ष्य है, ऐसा समझकर अन्त में भक्ष्ययुक्त बंशीको (मछली को फँसाने के काँटे को) भी मुँह में डालकर मछुवे द्वारा मारी जाती हुई फड़फड़ाती है वैसे ही तृष्णा भी तृण, पत्थर, काष्ठ आदि निखिल वस्तुओं को अपना भक्ष्य समझकर ग्रहण करती हुई अन्त में स्फूर्ति को प्राप्त होती है