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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verses 35–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, verses 35–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

विचित्रवर्णा विगुणा दीर्घा मलिनसंस्थितिः । शून्या शून्यपदा तृष्णा शक्रकार्मुकधर्मिणी ॥ ३५ ॥ अशनिर्गुणसस्यानां फलिता शरदापदाम् । हिमं संवित्सरोजानां तमसां दीर्घयामिनी ॥ ३६ ॥ संसारनाटकनटी कार्यालयविहंगमी । मानसारण्यहरिणी स्मरसंगीतवल्लकी ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे इन्द्रधनुष विस्मयोत्पादक अनेक प्रकार के रूपों से युक्त, विगुण-ज्या से रहित, लम्बा-चौड़ा, मेघाश्रित, शून्यात्मक आकाश में स्थित ओर स्वतः शून्य- अवस्तु है, वैसे ही यह तृष्णा भी विचित्र विषयों से अनुरंजित, असत्‌ गुणों से युक्त, दीर्घ, मलिन पुरुष में आश्रित और शून्यात्मक मन में स्थित है