Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 3

दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्ग द्वैत का अत्यन्त बाध हो जाने पर विद्वानों को जिस उपाय से आत्मतत्त्व अवेदनरूप ओर निष्क्रिय सिद्ध होता है, उस उपाय का वर्णन ।

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  1. Verse 1-अवेदना विदुर्मोषम्‌ ˆ इत्यादि पूर्वक्चन से जो कहा गया है उम्र विषय में श्री रामचन्द्रजी…
  2. Verse 2(यद्यपि विद्योन्युखत्वं संत्यज्य' इत्यादि से अवेदन शब्दार्थ का।निरुपण हो जाने से श्रीरामभ…
  3. Verse 3संसारदशा में प्रसिद्ध यह वेदन शब्द और इसका अर्थ ये दोनों एक तरह से रज्जूसर्पभ्रम के सदृश…
  4. Verse 4हे राघव, वेदनशब्द ओर उसके अर्थ का न जानना उत्तम हे तथा उनका ज्ञान होना दुःख है, इसलिए आप…
  5. Verse 5प्राणी के लिए सबसे बढ़कर दुःख पैदा करनेवाला वेदनशब्द और उसका अर्थ जानना है, इसलिए वेदनशब्…
  6. Verse 6व्यवहारकाल में उसका उच्छेद किस तरह करना चाहिए, इस पर कहते हैं / ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय रू…
  7. Verse 7इतत प्रकार के ज्ञानरुप व्यवहार से ही ज्ञानी को पूर्वोत्तर शुभाशुभ कर्मो का सम्बन्ध नहीं ह…
  8. Verse 8मूलसहित कर्मों का विनाश करने से संसार अशेषरूप से शान्त हो जाता है । जब कि आत्मतत्त्व भलीभ…
  9. Verse 9जैसे बिल्व की मज्जा भीतर बीज आदि का निर्माण करती है, परन्तु बीज आदि जैसे बिल्व से भिन्न न…
  10. Verse 10भूलोक की रचना के अन्तर्गत जम्बूद्वीप आदि की रचना जैसे भूमि से पृथक्‌ नहीं है, वैसे ही चिद…
  11. Verse 11जो जल है वही उसके अन्तर्गत द्रवत्व भी है । इसी तरह से चिति के अन्तर्गत विद्यमान चित्तव एव…
  12. Verse 12जैसे जल में द्रवत्व और तेज में प्रभा ग्रहकत्व-स्मर्तृत्व धर्मों से शून्य है, वैसे ही ब्रह…
  13. Verse 13चित्त और चित्त ग्रहकत्व और स्मर्तृत्व धर्म से शून्य कैसे हैं ? यह कहते हैं । "चेतयति इति…
  14. Verse 14इस रीति से चिंतनकरिया के चेतन से पृथक्‌ न सिद्ध होने पर विषय भी चेतन से पथक्‌ सिद्ध नहीं…
  15. Verse 15सम्पूर्ण कर्मों का विस्तार यह देह ही है, उसका मूल अहंकार है और शाखाएँ संसार है। अचेतनरूप…
  16. Verse 16यह नहीं प्रमञझना चाहिये कि विदाभास के उच्छेद से जीव का स्वरूप नष्ट हो यया, किन्तु उसने तो…
  17. Verse 17पूर्वोक्त रीति से ही कर्मबीज से मूल का त्याग किया जाता है, दूसरी रीति से नहीं । इसलिए हे…
  18. Verses 18–21इस कर्मबीज का मूल जब त्याग दिया जाता है तब जीव के लिए न चिदाभास की सत्ता रहती है और न दृश…
  19. Verse 22जैसे नदी के प्रवाह में पतित तृण, काष्ठ आदि सब कुछ स्पन्दित होता है । वैसे ही ज्ञानियों की…
  20. Verse 23वह पूर्वोक्त विज्ञान ही सम्पूर्णं कर्मो का परित्याग है और यह त्याग आत्मबोध से स्वतः सिद्ध…
  21. Verse 24विषयों से विनिर्मुक्त, वासनाओं से शून्य, सुदृढ़रूप से स्थित, शान्त, एकरूप, कृत और अकृत के…
  22. Verse 25दीर्घकाल से भूले गये कर्मो के सदुश विषयों का भलीभाँति पुनः-पुनः स्मरण न होना ही कर्मत्याग…
  23. Verse 26जो मिथ्या ज्ञानी पुरुष मूलत्याग के बिना केवल इन्द्रिय संयममात्ररूप करते हैं, उन अज्ञानी प…
  24. Verse 27मूलसहित कर्मत्याग के द्वारा जो ज्ञानी शान्ति प्राप्त कर बैठे हैं उन्हे यहाँ कृत-अकृत कर्म…
  25. Verse 28पूर्वोक्त रीति से चूँकि ज्ञानी-पुरुष कर्मबीजरूपी अंशो का समूल भलीभोति उच्छेदकर निरन्तर एक…
  26. Verse 29ज्ञानी पुरुष प्रारब्ध प्राप्त कार्य में कुछ प्रवृत्त हुए-से दिखाई देते हैं, परन्तु ये घूर…
  27. Verse 30विविध विषय-विलासों से परिपूर्ण मोक्षलक्ष्मी से ज्ञानी पुरुष ऐसे अपने देह आदि के भान को भू…
  28. Verse 31जो मूलोच्छेदपूर्वक छोड़ा जाता है वही छोड़ा गया कहा जाता है और जो मूलोच्छेद के बिना त्याग…
  29. Verse 32मूल के छेदन के बिना केवल शाखाग्र से काटा गया कर्मरूपी वक्ष फिर हजारों शाखा-प्रशाखाओं के व…
  30. Verse 33हे भद्र, पूर्वोक्त अवेदनस्वरूप से ही कर्मत्याग सिद्ध होता है, दूसरे से नहीं, इसलिए बतलाये…
  31. Verse 34श्रीरामजी, जो कोई पुरुष उस प्रकार का कर्मत्याग न कर दूसरे अत्यागरूपी त्याग को करने में प्…
  32. Verse 35आत्मबोध से कर्मत्याग स्वयं ही सिद्ध हो जाता है । इच्छारहित जीवन्मुक्तो की बड़ी-बड़ी आडम्ब…
  33. Verse 36चेष्टारूप स्पन्द भी निष्फल है
  34. Verse 37ज्ञान से कर्मत्याग के सिद्ध हो जाने पर वासनाशून्य जीवन्मुक्त पुरुष चाहे घर में रहे या जंग…
  35. Verse 38शान्त पुरुष के लिए घर ही निर्जन दूरस्थ जंगल है तथा अशान्त पुरुष के लिए निर्जन महान्‌ जंगल…
  36. Verse 39परिशान्तमति तत्त्वज्ञानी पुरुष के लिए स्वप्न में भी निर्जन, निर्मल, विस्तृत और अति मनोहर…
  37. Verse 40ज्ञानाग्नि से दग्ध हुए दृश्य प्रपंचवाले तत्त्वज्ञानी के लिए यह संसार ही स्पन्दन से शून्य,…
  38. Verse 41अनन्त संकल्पोँवाले तथा जगत्‌ की स्थिति को हृदय में रखनेवाले अज्ञानी के लिए सम्पूर्णं सागर…
  39. Verse 42अज्ञानी दीन मनुष्य के लिए विविध द्रन्द्रों से भरी हुई, अनेकविध कार्यो के आरम्भ से युक्त त…
  40. Verse 43हे श्रीरामजी, अज्ञानी पुरुष के लिए विविध आवश्यक कार्यो से यानी धनोपार्जन, धनव्यय, दूरदेश…