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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

विविधकार्यविकारदशामयी सपुरपत्तनमण्डलपर्वता । मुकुरकोश इव प्रतिबिम्बिता हृदि भवत्यमला मलिने मही ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, अज्ञानी पुरुष के लिए विविध आवश्यक कार्यो से यानी धनोपार्जन, धनव्यय, दूरदेश में प्रवास, कलह आदि से सर्वदा ही लोभ, मोह, शोक, भय, आसक्ति आदि विकारों से पूर्ण छोटे-छोटे कसबों, बड़े-बड़े नगरों तथा देश-देशान्तरों एवं पर्वतो से युक्त यह सारी पृथिवी मलिन हृदय में जैसे दर्पण में प्रतिबिम्बित हो, वैसे प्रतिबिम्बित होती ही है