Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
चेतनं कर्म तच्चेतद्भाति स्पन्द इवानिलः ।
अहेतुकं यदात्मैतद्बहिरन्तश्च सार्थधीः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस रीति से चिंतनकरिया के चेतन से पृथक् न सिद्ध होने पर विषय भी चेतन से पथक् सिद्ध
नहीं है, यह कहते हैं ।
वायु और उसके स्पन्दन की नाई जब चेतन और उसकी अर्थप्रकाशनरूप क्रिया अहेतुक है,
तब स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था में होनेवाला वह अर्थप्रकाश आत्मचेतनरूप ही है, भिन्न नहीं
है