Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
जनस्याज्ञस्य दीनस्य विविधद्वन्द्वसंकटा ।
सारम्भा विविधाकारा हृद्येव ग्राममण्डली ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानी दीन
मनुष्य के लिए विविध द्रन्द्रों से भरी हुई, अनेकविध कार्यो के आरम्भ से युक्त तथा अनेक तरह के
आकारो से समन्वित ग्रह मण्डली हृदय के भीतर ही विराजमान है