Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
कर्मत्यागे स्थिते बोधाज्जीवन्मुक्तो विवासनः ।
गृहे तिष्ठत्वरण्ये वा शाम्यत्वभ्येतु वोदयम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान से कर्मत्याग के सिद्ध हो जाने पर वासनाशून्य जीवन्मुक्त
पुरुष चाहे घर में रहे या जंगल में, धनादि सम्पत्ति के नाश से दरिद्र हो या धनादि सम्पत्ति की वृद्धि
से अभ्युदय को प्राप्त हो, किन्तु है वह रहता सर्वत्र एक-सा ही