Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
बोधात्मकतया कर्मत्यागः संपद्यते स्वयम् ।
दग्धबीजा निरिच्छोच्चैरक्रियैव भवेत्क्रिया ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मबोध से कर्मत्याग स्वयं ही सिद्ध हो जाता है । इच्छारहित
जीवन्मुक्तो की बड़ी-बड़ी आडम्बरपूर्ण क्रियाएँ भी अक्रियारूप ही हैं, क्योंकि उनका मूलभूतबीज
जल चुका है । जिसके तन्तु जल चुके हैं ऐसा वस्त्र वस्त्र के सदृश दिखाई दे रहा भी वास्तविक वस्त्र
नहीं है