Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verses 18–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, verses 18–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 18-20

संस्कृत श्लोक

कर्मबीजकलात्यागे त्वेतस्मादितरात्मनि । अविद्यमाने जीवस्य तज्ज्ञैर्विदितवस्तुभिः ॥ १८ ॥ शान्तैर्न गृह्यते किंचिन्न च संत्यज्यतेऽपि च । त्यागादानेन जानन्ति ततस्तैः शान्तमानसम् ॥ १९ ॥ आकाशशून्यहृदयैर्ज्ञैर्यथास्थितमास्यते । क्रियते च यथाप्राप्तं नाप्येतैः क्रियतेपि च ॥ २० ॥ प्रवाहपतितं सर्वं स्पन्दते शान्तमानसम् । तेषां कर्मेन्द्रियाण्येवमर्धसंसुप्तबालवत् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

इस कर्मबीज का मूल जब त्याग दिया जाता है तब जीव के लिए न चिदाभास की सत्ता रहती है और न दृश्यप्रपंच की ही सत्ता रहती है । ऐसी स्थिति में विदिततत्त्व शान्त ब्रह्मज्ञानी न किसी वस्तु का ग्रहण करते हैं और न किसी वस्तु का परित्याग ही करते हैं, क्योकि उस समय उन्हें त्याग और ग्रहण का परिज्ञान ही नहीं रहता । अनन्तर वे आकाश के सदृश निर्मल एवं विशद हृदय से युक्त होकर ज्ञानी पुरुष मानसिक विकल्पों से शून्य होकर जैसी उनकी मूल स्थिति है उसी रीति से अवस्थित रहते हैं । जो कुछ प्राप्त हो जाता है उसे करते हैं और नहीं भी करते हैं