Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
विस्तारः कर्मणां देहः सोऽहंतात्मा ससंसृतिः ।
अचेतनानहन्त्वेन शाम्यत्यस्पन्दवातवत् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण कर्मों का विस्तार यह देह ही है, उसका मूल अहंकार है और शाखाएँ संसार है।
अचेतनरूप (चिदाभासरूप क्रिया से शून्य) मूलोच्छेदक अनहंकार से शाखाओं के सहित यह ऐसे
शान्त हो जाता है, जैसे स्पन्दनशून्य वायु