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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अवेदनं वेदनस्य मुनीन्द्र क्रियते कथम् । नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

-अवेदना विदुर्मोषम्‌ ˆ इत्यादि पूर्वक्चन से जो कहा गया है उम्र विषय में श्री रामचन्द्रजी शंका करते हैं श्रीरामजी ने कहा : हे मुनीन्द्र, जो वेदन (ज्ञान) पदार्थ है उसे अवेदनरूप कैसे बनाया जा सकता है ? न तो असत्‌वस्तु की सत्ता हो सकती है और न सद्वस्तु का अभाव हो सकता है

सर्ग सन्दर्भ

दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्ग द्वैत का अत्यन्त बाध हो जाने पर विद्वानों को जिस उपाय से आत्मतत्त्व अवेदनरूप ओर निष्क्रिय सिद्ध होता है, उस उपाय का वर्णन ।