Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
चेतनं कर्म तत्स्वान्तर्न्निर्मूलं भ्रमयक्षवत् ।
उदेत्यहेतुकं तच्चेन्नोदितं तन्न विद्यते ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त और चित्त ग्रहकत्व और स्मर्तृत्व धर्म से शून्य कैसे हैं ? यह कहते हैं ।
"चेतयति इति चित्" (जो प्रकाशन करता है वह चित् है ) इस व्युत्पत्ति से अर्थ का प्रकाश
चिति का कर्म ही मालूम पड़ता है । परन्तु यह कूटस्थ चैतन्य में निर्मूल भ्रमसिद्ध यक्ष के समान
किसी कारण के बिना मिथ्यारूप ही प्रतीत होता है, इसलिए चिति में उसकी उत्पत्ति ही नहीं है और
न उसका अस्तित्व ही है