Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 25
चौबीसवाँ सर्ग समाप्त पचीसवों सर्ग अविद्या से उत्पन्न संवेदन आदि चार संसार के बीज हैँ ओर परमात्मा का तच्चज्ञान ही संसार ओर उन बीजों का विनाशक है, यह वर्णन ।
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- Verse 1इस तरह मकि युनि ने अपने ससाररूफी अनर्थ का वर्णन कर जब उसके निरास का उपाय पूछा तब उसके कीज…
- Verse 2समृद्ध लताएँ मधुमास के लतारस में विद्यमान रहती है
- Verse 3यह अतिगहन जो संसारमार्ग है, उस पर वासना के आवेश से चल रहे जीव के प्रति ही चित्र-विचित्र अ…
- Verse 4इसीलिए विवेकी पुरुष का विषयों में दोषभावना और ब्रह्मभावना से इन बीजों का विनाश हो जाने पर…
- Verse 5वासना ही आगे का संसार भी बनाती है, यह कहते हैं । जिस प्रकार वसन्त ऋतु की रसलेखा वन में फै…
- Verse 6जैसे पृथ्वी में मधुमास का रस वन बनकर स्थित रहता है, वैसे ही चिति में (अज्ञानाश्रय जीव-चैत…
- Verse 7परमार्थ वस्तु का अपनाप करनेवाले अज्ञान को बतलाने के लिए पहले पार्थ वस्तु का कथन करते हैं…
- Verse 8इस तरह चारों ओर निरन्तर प्रकाशित हो रहा “चिन्मात्ररूप वेदनात्मा देह-इन्द्रिय आदि से भिन्न…
- Verse 9अविद्या से साधित वस्तु का परिणाम दिखलाते हैं / बालक को वेताल की तरह, सत् की नाई भासित हो…
- Verse 10भेद पैदा करनेवाली द्वश्यरूप उपाधियों का बाध हो जाने पर सभी ज्ञानो में एकता आ जाती है, यह…
- Verse 11(बिन््यात्रावमलाच्छून्यादते किविन्न विद्यते“ यह जो कल है इम्रका दृष्टांतों से उपपपादन कर…
- Verse 12विचार करने पर चिन्मयकय से स्फुरित हो रहे पदार्थों की विदैकरसता ही अन्त में चलकर प्राप्त ह…
- Verse 13यदि द्रष्टा आदि त्रिपुटी के बोध से आध्यासिक अभेद कड कहे, तो उसके मिथ्याभूत होने से एकमात्…
- Verse 14जो एक जाति के पदार्थ हैं; वे ही एक दूसरे में मित्र जाने पर एकरुूप हो जाते हैं; यह बात जल…
- Verse 15काष्ठ आदि दृश्य पदार्थों का स्फुरण के साथ अभेद न मानने पर खरगोश के सीय के समान उनका अत्यन…
- Verse 16अपने सिद्धान्त में तो दोष नहीं है, यह कहते हैं । यद्यपि अपने सिद्धान्त से यह दृश्यप्रपंच…
- Verse 17ऐसी स्थिति मे (जगत् बोधरूय ही है, ब्रोधानतिरिक्त (बोधरूप) प्रकाशवाला होने से जो जिससे अन…
- Verse 18यदि यह शंका हो कि क्रिया ओर क्रियावान् एव! अवयव ओर अक्यकी इन दोनों का तो समवायसम्बन्ध से…
- Verse 19दूध और जल की नाई अन्योन्य एक रूप बन जाना ही एकता है। द्रष्टा और दृश्य पदार्थों का भी अन्य…
- Verse 20उपयुक्त युक्तियों से जब यह सिद्ध हो बुका कि सव दृश्य चिन्मात्रस्वरूप हैं और तत्पदार्थ चित…
- Verse 21इसी विष्य का उपपादन करते हैं / एक चन्द्र में दो चन्द्रमा की बुद्धि या मृगतृष्णा में जलबुद…
- Verse 22अहन्ता त्याग होने पर ममता स्वयं ही त्यक्त हो जाती है. यह कहते हैं । “यह मेरा है” यह ममता…
- Verse 23अल में असत्य अहंकार अन्दर बैठ कर सत्य आत्मा को कैसे नहीं ढक सकता, जैसे कि (भीतर बैठकर बेर…
- Verse 24जड और ज्ञान की वास्तविक एकता हे ओर वही आत्मरूप है, यों जो जैमिनिमतावलम्बी लोग मानते हे, उ…
- Verse 25क्यों किसी एक रुप को नहीं छोड़ता 2 इस फर कहते हैं / जो अजड वस्तु है, वह जडता कभी धारण नही…
- Verse 26जब ऐसी ही स्थिति है, तब आत्मवादी लोग एक दूसरे के विरुद्ध तरह-तरह के आत्मा के स्वरुप क्यो…
- Verse 27इसीलिए स्व-स्व वासनारूपी वायुओं द्वारा इधर-उधर उड़ाये गये उपनिषद्दृष्टि से च्युत पुरुषरूप…
- Verse 28उका वर्णन करते हुए उपत्रहार करते हैं । अपनी वासना और अपने-अपने अभिमान के अनुसार राग आदि र…