Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
विवेकिनो वासनया सह संसारसंभ्रमः ।
क्षीयते माधवस्यान्ते शनैरिव धरारसः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए विवेकी पुरुष का विषयों में दोषभावना और ब्रह्मभावना से इन बीजों का विनाश हो
जाने पर वासना के साथ- समस्त संसार नष्ट हो जाता है यह कहते हैं /
विवेकी पुरुष का संसारसम्भ्रम तो, वसन्त के अन्त में पृथिवी के रस के सदृश, धीरे-से वासना
के साथ नष्ट हो जाता है