Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
यः कुण्डबदरन्यायो या घटाकाशयोः स्थितिः ।
स संबन्धोऽपि नैवान्यमैक्यं ह्यन्योन्यवेदनम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
अल में असत्य अहंकार अन्दर बैठ कर सत्य आत्मा को कैसे नहीं ढक सकता, जैसे कि
(भीतर बैठकर बेर) कुण्ड को ढक सकता हैं या वैसे न परिच्छिन्न बना सकता है, जैसे कि घड़ा
आकाश को परिच्छिन्न बना सकता है. इसे कहते हैं /
जो कुण्डबदरन्याय है यानी जैसी कुण्डे (प्याले) की और वैर की स्थिति है या जैसी घट और
आकाश की स्थिति है, तात्पर्य यह है कि जिस सम्बन्ध से बैर कुण्डे के अन्दर प्रविष्ट होकर उसको
दबा सकता है या घड़ा आकाश को छोटा बना सकता है वह सम्बन्ध भी आत्मा के साथ नहीं है,
जो कि अत्यन्त भिन्न अहंकारकल्पना की सामर्थ्य रखता है, ऐसी स्थिति में वास्तविक ऐक्य ही है,
वह एेक्य अन्योन्य वेदनरूप है यानी चन्द्र में द्रैतपन की नाई भेद से अविद्या द्वारा कल्पित भेदरूप
आत्मा का जो स्वप्रकाश के बल से स्फुरण है, वह अन्योन्य वेदन-सा हो जाता है