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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

नाजडं जडतामेति स्वभावा ह्यनपायिनः । यच्चाजडं जडं दृष्टं द्वैति तत्रास्ति नैकता ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

क्यों किसी एक रुप को नहीं छोड़ता 2 इस फर कहते हैं / जो अजड वस्तु है, वह जडता कभी धारण नहीं कर सकती, क्योकि धर्म (स्वभाव) कभी भी छुटनेवाले होते नहीं । जो आत्मतत्त्व अजड है उसे आपने जड़रूप अंशान्तर से देखा, पर वह तो कोई दूसरी ही चीज है, उसकी अजड़ के साथ एकता है ही नहीं, ऐसी स्थिति में जड़ और बोध की एकता कैसे हो सकती है ?