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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

भ्रान्त्वा भृशं करतलाहतकन्दुकाभं लोकाः पतन्ति निरयेषु रसेन रक्ताः । क्लेशेन तत्र परिजर्जरतां प्रयाताः कालान्तरेण पुनरन्यनिभा भवन्ति ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

उका वर्णन करते हुए उपत्रहार करते हैं । अपनी वासना और अपने-अपने अभिमान के अनुसार राग आदि रसों से रंगे गये लोग करतल से ताडित गेंद के सदृश इधर-उधर खूब घूम-फिरकर नरकों में गिरते हैं वहाँ पर दीर्घकाल तक तरह-तरह की यातनाओं के क्लेशो से सब ओर से जर्जर होकर कालान्तर में स्थावर, कृमि, कीट आदि जन्म लेकर अन्य-से हो जाते हैं, फिर मनुष्यजन्म उनके लिए दुर्लभ ही बना रहता है