Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
अन्योन्यावेदनं त्वैक्यं भागशो गतमप्यलम् ।
अजडं वा जडं वापि नैकं रूपं विमुञ्चति ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जड और
ज्ञान की वास्तविक एकता हे ओर वही आत्मरूप है, यों जो जैमिनिमतावलम्बी लोग मानते हे,
उनके मत में भी वह ऐक्य जडवस्तुगत जड़ और ज्ञानगत अजड होगा, यों किसी एक रूप को वह
कभी छोड़ ही नहीं सकता, ऐसी स्थिति में जड़ अंश में उसका स्फुरण न होते हुए भी चिदंश में
स्फुरित हो रहा वह अन्योन्यवेदनरूप निर्विषयक एेक्य आ ही जाता है